आयुर्वेद

दुनिया में ऐसी कोई भी बीमारी नहीं जो इससे ठीक ना हो, जहां मिले तुरंत इसे तोड़ कर रख लें

bhatkaitya

भटकटैया एक छोटा कांटेदार पौधा जिसके पत्तों पर भी कांटे होते हैं। इसके फूल नीले रंग के होते हैं और कच्‍चे फल हरित रंग के लेकिन पकने के बाद पीले रंग के हो जाते हैं। यह प्राय पश्चिमोत्तर भारत में शुष्क स्थानों पर पाई जाती है। यह पेट के अलावा कई प्रकार की स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं में उपयोगी होती है। ये कच्ची हालत में हरे रंग के, सफेद धारियों से युक्त और पक्की अवस्था में पीले रंग के, हरी धारियों से युक्त होते हैं। बैंगन के समान इसके बीज अनेक संख्या में छोटे और चिकने निकलते हैं। जमीन पर कुछ फैला हुआ, काँटों से भरा होता है। भटकटैया के पत्ते 3-8 इंच तक लम्बे, 1-2 इंच तक चौड़े, किनारे काफी कटे तथा पत्र में नीचे का भाग तेज काँटों से युक्त होता है। भटकटैया के फूल नीले रंग के तथा फल छोटे, गोल कच्ची अवस्था में हरे तथा पकने पर पीले रंग की सफेद रेखाओं सहित होते हैं।

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भटकटैया का पौधा ब्रेन ट्यूमर के उपचार मे सहायक होता है। वैज्ञानिक के अनुसार पौधे का सार तत्व मस्तिष्क में ट्यूमर द्वारा होने वाले कुशिंग बीमारी के लक्षणों से राहत दिलाता है। मस्तिष्क में पिट्युटरी ग्रंथि में ट्यूमर की वजह से कुशिंग बीमारी होती है।

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भटकटैया दर्दनाशक गुण से युक्त औषधि है। दर्द दूर करने के लिए 20 से 40 मिलीलीटर भटकटैया की जड़ का काढ़ा या पत्ते का रस चौथाई से 5 मिलीलीटर सुबह शाम सेवन करने से शरीर का दर्द कम होता है।
बच्चे जब खाँसते-खाँसते दूध डाल देते और उनका मुँह लाल हो जाता है, तो भटकटैया के फूल को केसर में पीसकर शहद के साथ दें। फूल को जलाकर मधु मिलाकर देने से भी शीघ्र लाभ होता है।

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